जब हमारा सूरज एक है ,चाँद एक है,हमारी प्रथिवी एक है तो हम टुकड़ो में क्यों बटे है?
क्या ये विश्व एक नहीं हो सकता?
क्या हम बजाय हिन्दू ,मुस्लिम,भारतीय,अमेरिकी सोचने के एक इन्सान को सिर्फ इन्सान की तरह ही नहीं देख सकते है?
क्या सच में विश्व एक नहीं हो सकता है?
विश्व को एक करने से पहले हमे ये जानना पड़ेगा के ये अलग-अलग क्यों है!
मेरे विचार से ये ऐसा इसलिए है क्योकि हम अब भी अपनी कबीलाई मानसिकता को मिटा नहीं सके है!
हम अलग-अलग है क्योकि हम सोचते है हम श्रेष्ठ है और बाकि बेवकूफ है?
हमारा अहम् ही हमें अलग-अलग रखे हुए है
हमें अगर विश्व को एक करना है तो हमे खुद को बदलना होगा
आगे बढकर सबको गले लगाना होगा ,तो क्या आप अपने को बदल रहे है ?
मैं प्राथना करता हूँ की आप बदले विश्व बदले!
धन्यवाद!
-KAKA
